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वास्तु शास्त्र

दिशाओं के अनुसार ऊर्जा संतुलन के मूल सिद्धांत।

वास्तु शास्त्र

दिशाओं के अनुसार ऊर्जा संतुलन के मूल सिद्धांत

ईशान (उत्तर-पूर्व)

जल

पूजा एवं ध्यान स्थान; जल तत्व का स्थान।

आग्नेय (दक्षिण-पूर्व)

अग्नि

रसोई एवं अग्नि संबंधी कार्य के लिए उत्तम।

नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम)

पृथ्वी

शयनकक्ष एवं भारी वस्तुओं हेतु स्थिर दिशा।

वायव्य (उत्तर-पश्चिम)

वायु

अतिथि कक्ष एवं भंडारण के लिए उपयुक्त।

ब्रह्म स्थान (मध्य)

आकाश

खुला एवं स्वच्छ रखें; ऊर्जा का केंद्र।

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